महात्मा गाॅंधी के आर्थिक विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता
डाॅं. सत्यभामा सौरज
शोधार्थी, राजनीति शास्त्र, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन, मध्यप्रदेश
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू कतण्ेंजलं/लउंपसण्बवउ
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यह शोध पत्र महात्मा गाॅंधी के आर्थिक विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता पर आधारित है जो वर्तमान में इसकी महत्व का विश्लेषण किया जा रहा है, महात्मा गाॅंधी ने इस विचारधारा को भी चुनौती दी और देश के गरीब किसान, दस्तकार और मजदूर के रोजगार और आजीविका को अंधाधुंध मशीनीकरण से बचाने के लिए उन्होंने कहा कि उससे मनुष्य को सहारा मिलना चाहिए। वर्तमान यह झुकाव है कि कुछ लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाए और जिन करोड़ों स्त्री-पुरूषों के मुह से रोटी छीनी है उन बेचारों की जरा भी परवाह न की जाए। सच्ची योजना तो यह होगी कि भारत की संपूर्ण मानव शक्ति का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। मानव श्रम की परवाह न करने वाली कोई भी योजना न तो मुल्क में संतुलन कायम रख सकती है और न इनसानों को बराबरी का दर्जा दे सकती है। इसी तरह गाॅंधीजी ने कहा मनुष्य का लक्ष्य अपने उपभोग को निरंतर बढ़ाना नहीं अपितु सादगी के जीवन में संतोष प्राप्त करना है। यदि शक्तिशाली व अमीर लोग इस भावना मंे जिएं जो गरीबी के लिए संसाधन बचने की संभावना कहीं अधिक होगी।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू आर्थिक विचारों, वर्तमान प्रासंगिकता, अंधाधुंध मशीनीकरण, आजीविका, मानव श्रम, संतुलन, संसाधन।
प्रस्तावना:-
महात्मा गांधी की अर्थव्यवस्था व अर्थशास्त्र के बारे में बहुत मौलिक सोच थी। यह सोच उस समय के प्रचलित विचारों की परवाह न कर सीधे-सीधे ऐसी नीतियों की मांग करती थी जिससे गरीबों को राहत मिले। साथ ही उन्होंने ऐसे सिद्धांत उपनाने को कहा जिनसे दुनिया में तनाव व हिंसा दूर हो तथा पर्यावरण को नुकसान न पहुंचें। गांधीजी के लिए विश्व शांति, संतोष व पर्यावरण की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण थे। वह इसी के अनुकूल आर्थिक नीतियों की बात करते थे। उन्होंने अर्थनीति और नैतिकता में कभी भेद नहीं किया। गांधी ने स्पष्ट लिख मुझे स्वीकार किया कि मैं अर्थविद्या और नीतिविद्या में कोई भेद नहीं करता। जिस अर्थविद्या से व्यक्ति या राष्ट्र के नैतिक कल्याण को हानि पहुंचती हो उसे मैं अनीतिमय और पापपूर्ण कहूंगा। उदाहरण के लिए जो नीति एक देश को दूसरे देश का शोषण करने की अनुमति देती है वह अनैतिक है। जो मजदूरों को योग्य मेहनताना नहीं देते और उनके परिश्रम का शोषण करते हैं उनसे वस्तुएं खरीदना या उन वस्तुओं का उपयोग करना पाप है। उन्होंने शोषण विहीन व्यवस्था की मांग रखी ताकि सबकी बुनियादी जरूरतें पूरी हों। उन्होंने कहा कि गरीब लोंगो को भी उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण मिले ताकि उनका शोषण न हो। गांधी ने लिख मेरी राय में न केवल भारत की, बल्कि सारी दुनिया की अर्थ रचना ऐसी होनी चाहिए कि किसी को भी उन्न और वस्त्र के अभाव में तकलीफ न सहनी पड़े। दूसरे शब्दों में हर एक को इतना काम अवश्य मिल जाना चाहिए कि वह अपने खाने-पहनने की जरूरतें पूरी कर सके। यह आदर्श तभी कार्यान्वित किया जा सकता है जब जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं के उत्पादन के साधन जनता के नियंत्रण में रहें। वह हर एक को बिना किसी बाधा के उसी तरह उपलब्ध होने चाहिए जिस तरह कि भगवान की दी हुई हवा और पानी हमें उपलब्ध है। किसी भी हालत में वे दूसरों के शोषण के लिए चलाए जाने वाले व्यापार का वाहन न बनें। किसी भी देश या समुदाय का उन पर एकाधिकार अन्यायपूर्ण होगा। हम आज न केवल अपने इस दुखी देश में, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी जो गरीबी देखते हैं उसका कारण इस सरल सिद्धांत की उपेक्षा है। प्रायः यही माना जाता है कि निरंतर आर्थिक विकास व वृद्धि से ही दुनिया से गरीबी व अभाव दूर होगी, लेकिन महात्मा गांधी ने यह पहचान लिया था कि इस तरह के आर्थिक विकास के तहत गरीबी व विषमता बढ़ने की संभावना भी मौजूद रहती है। अतः उन्हांेने आर्थिक विकास को नहीं, बल्कि गरीब आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं को अपनी आर्थिक सोच का केंद्र बनाया। उन्होंने देश के नेताआंे और नियोजकों से विशेष आग्रह किया कि जब तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौट आजमाओ।
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा है, उसकी शुक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोंगो को स्वराज मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त? इस तरह महात्मा गांधी गरीब आदमी को आर्थिक चिंतन के कंेद्र मंे ले आए। तेजी से होने वाला तकनीकी बदलाव और मशीनीकरण उस समय की विचारधारा पर भी छाया हुआ था, क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर यूरोप में समृद्धि आई थी। पर महात्मा गांधी ने इस विचारधारा को भी चुनौती दी और देश के गरीब किसान, दस्तकार और मजदूर के रोजगार और आजीविका को अंधाधुंध मशीनीकरण से बचाने के लिए उन्होंने जोर दिया। यंत्रों के बारे में उन्होंने कहा कि उससे मनुष्य को सहारा मिलना चाहिए। वर्तमान यह झुकाव है कि कुछ लोगों के हाथ में खुब संपत्ति पहुंचाई जाए और जिन करोड़ों स्त्री-पुरूषों के मुंह से रोटी छीनी है उन बेचारों की जरा भी लापरवाह न की जाए। सच्ची योजना तो यह होगी कि भारत की संपूर्ण मानव शक्ति का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए। मानव श्रम की परवाह न करने वाली कोई भी योजना न तो मुल्क में संतुलन कायम रख सकती है और न इनसानों को बराबरी का दर्जा दे सकती है। इसी तरह गांधीजी ने कहा मनुष्य का लक्ष्य अपने उपभोग को निरंतर बढ़ाना नहीं अपितु सादगी के जीवन में संतोष प्राप्त करना है। यदि शक्तिशाली व अमीर लोग इस भावना में जिएं तो गरीबों के लिए संसाधन बचने की संभावना कहीं अधिक होगी। उनके शब्दों में, सच्ची सभ्यता का लक्षण संग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्छा से उसे उसे कम करना है। ज्यों ज्यों हम संग्रह घटाते जाते हैं त्यों-त्यों सच्चा सुख और संतोष बढ़ता जाता है, सेवा की शक्ति बढ़ती जाती है। त्याग की यह शक्ति हममें अचानक नहीं आएगी। पहले हमें ऐसी मनोवृत्ति पैदा करनी होगी कि हमें उन सुख-सुविधाओं का उपयोग नही करना है, जिनसे लाखों लोग वंचित हैं। समता और सादगी को एक महत्वपूर्ण उद्धदेश्य के रूप में प्रतिष्ठित कर पर्यावरण का नाम लिए बिना ही महात्मा गांधी हमें पर्यावरण संरक्षण के मूल से परिचित करा गए। उन्होंने कहा भी कि प्रकृति सब मनुष्यों की जरूरतें तो पूरी कर सकती है, लेकिन लालच नहीं।
अध्ययन के उद्धेश्य:-
1. महात्मा गाॅंधी के वर्तमान आर्थिक प्रासंगिकता का अध्ययन करना।
2. महात्मा गाॅंधी के आर्थिक विचारी की उपयोगिता का अध्ययन करना।
शोध-प्राविधि:-
यह उद्यायन वर्तमान की परिपेक्ष पर आधारित है जिसमें आंकड़े द्वितीयक समंक पर आधरित है। आंकड़ों का संकलन पत्रिका, इन्टरनेट, शोध पत्र, इन्टरनेट में उपलब्ध गाॅंधी के जीवनी इत्यादि पर आधारित है।
आर्थिक विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता:-
समग्र गा्रम-सेवा का अपने गांव के प्रत्येक निवासी से परिचय होना चाहिए और जितना बन पडे उतनी सेवा ग्रामवासियों की करनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि वह सारा काम अकेले ही कर सकता है। वह ग्रामवासियों को यह बताएगा कि वे किस प्रकार अपनी सहायता स्वयं कर सकते है और उन्हें जो सहायता एवं सामग्री की आवश्यकता होगी, उसे उनके लिए उपलब्ध कराएगा। वह अपने सहायकों को भी प्रशिक्षित करेगा। वह ग्रामवासियों के मन को इस तरह जीतने का प्रयास करेगा कि वे उसके पास परामर्श के लिए आने लगेंगे।
मान लीजिए मैं एक कोल्हू लेकर किसी गांव में जाकर बस जाता हूं जो मैं 15-20 रूपये माहकर कमाने वाला कोई साधारण तेली कहम् होऊंगा। मैं तो एक महात्मा तेली होऊंगा। मैंने यहां ’’महात्मा’’ शब्द का प्रयोग विनोद के लिए किया है, मेरा असली आशय तो है कि तेली के रूप में मैं ग्रामवासियों के अनुकरण के लिए एक आदर्श बन जाउंगा। मैं ऐसा तेली होउंगा जिसे गीता और कुरान की जानकारी है। मैं इतना पढ़ा-लिख होउंगा कि उनके बच्चों को शिक्षा दे सकंू। यह बात और है कि मुझे इसके लिए शायद समय न मिले। तब गांव वाले मेरे पास आएंगे और मुझसे कहेंगे, ’’मेहरबानी करके हमारे बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था कर दीजिए।’’ तब मैं उनसे कहूंगा, ’’मैं आपके लिए एक शिक्षक की व्यवस्था कर सकता हूं, पर आपको उसका खर्च बर्दाश्त करना होगा।’’ और वे खुशी-खुशी इसके लिए तैयार हो जाएंगे।
मैं उन्हें कताई सिखाउंगा और जब वे मुझसे किसी बुनकर को लाने के लिए आग्रह करेंगे तो मैं उन्हें उसी प्रकार बुनकर लाकर दूंगा जिस प्रकार मैंने उन्हें शिक्षक लाकर दिया है। यह बुनकर उन्हें सिखायेगा कि वे अपना कपडा किस प्रकार बुन सकते है। मैं उन्हें स्वास्थ्य-रक्षा और सफाई के महत्व के प्रति जागरूक करूंगा और जब वे मुझसे कहेंगे कि मैं उनके लिए एक मेहतर की व्यवस्था कर दूं तो मैं कहूंगा, ’’ मैं आपका मेहन हूं और आपको इस काम की शिक्षा मैं दूंगा।’’
समग्र ग्राम-सेवा की मेरी धारणा यह है। आप कह सकते हैं कि इस जमाने में मुझे ऐसा तेली कहम् नहीं मिलेगा जैसा कि मैंने यहां पर वर्णन किया है। मेरा उनर होगा कि यदि ऐसा है तो हम इस जमाने में अपने गांवों के सुधार की आशा नहीं कर सकते.... आखिर, जो आदमी तेल-मिल चलाता है वह तो होता ही है। उसके पास पैसा तो होता है, पर उसकी शिक्षा उसके पैसे में निहित नहीं होती। उसकी सच्ची शिक्षा उसके ज्ञान में निहित होती है। सच्चा ज्ञान मनुष्य को नैतिक प्रतिष्ठा और नैतिक शक्ति देता है। ऐसे व्यक्ति से हर कोई परामर्श लेना चाहता हैं। ;हरि, 17-3-1946, पृ. 42 द्ध
महात्मा गाॅंधी ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना:- गांधीवाद कुछ अधिक नाकाफी साबित हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि देश में आज जो कुछ चल रहा है वह गांधीवाद नहीं है, बल्कि गांधीवाद और माक्र्सवाद का एक घटिया सम्मिश्रण है। यह बात सार रूप में सही है, लेकिन इससे गांधीवाद की कमजोर साबित होती है कि माक्र्सवाद उसे सम्मिश्रण के लिए मजबूर कर देता है, और यह भी कि उसका सर्वश्रेष्ठ अंश पर नहीं आ पाता। गांधीवाद आज अपनी दो शाखाओं में प्रकट हो रहा है, सरकारी और मठी। जिसे गांधीवाद माना जाता है, उसमेूं ये दोनों सरकारी और मठी रूप ही शामिल हैं। कुजात गांधीवाद के बारे में आगे कहूंगा। अपने मान्य रूप में गांधीवाद, जीत हामिस करने के बाद बेजान साबित हुआ है। उसमें कोई तेजी नहीं रह गई है, जिससे शक पैदा होता है कि शायद उसमें कभी तेजी थी ही नहीं। मठी गांधीवाद पूरी तरह सरकारी सहारे पर जिंदा है। सरकारी गांधीवाद एक सीमित सरकारी क्षेत्र वाले नियोजन की हवाई चीज के पीछे भागने के अलावा कुछ नहीं करता। दोनों ही आत्मतुष्ट और खुश हैं, जिसमें नीचे से उपर बढती हुई विलासिता का भी अभाव नहीं है।
विपक्ष के रूप में गांधीवाद अपने ढंग से वंतिकारी था। सरकारी गांधीवाद बिलकुल रूढिवादी, प्रतिष्ठित और बेजान रूप में दकियानूसी है। माक्र्सवाद, अपनी सीमाऔं के अन्दर विपक्ष और सरकार दोनों ही रूपों में वन्तिकारी होता है। उसके वंतिकारी चरित्र में सरकारी होने या न होने से कोई बाधा या फर्क नहीं पडता। समय-समय पर उसकी गतिशीलता में जो बाधा आती है, वह मुख्य रूप से तात्कालिक विदेश नीति के कारण, और दूसरे नम्बर पर सैद्धान्तिक प्रश्नों की विछत समझ से पैदा होती है। उसके सनारूढ होने का उसके अत्साह में कमी आने से कोई खास संबंध नहीं होता, उत्साह में कमी दूसरे कारणों से आती है। वास्तव में माक्र्सवाद जब सना के लिए संघर्ष करता है, उसकी तुलना में सना हासिल करने के बाद अधिक वंतिकारी होता है। सना हासिल करने के बाद उसके लिए जरूरी होता है कि वह संपति, धर्म और अन्य सम्बन्धों की पुरानी व्यवस्था को बदले। गांधीवाद के साथ ऐसा नहीं है। सरकार में आने के बाद गांधीवाद का आचरण ऐसा रहा है, जैसे उसे कुछ करना ही नहीं, उसके अपने कोई कार्य ही नहीं हैं। सरकारी गांधीवाद ने अपने रोजमर्रा के काम की सूची गैर-गांधीवादी कितबों से बनाई है, जिसका आधार है कि परिवर्तन जितना कम हो उतना अच्दा और जिसका उदद्ेश्य यह नहीं है कि वह अन्य सिद्धान्तों से भिन्न रीति से शासन चल सकता है, बल्कि यह कि वह अन्य सिद्धान्तों जितना ही अच्छा शासन चला सकता है। सरकारी गांधीवाद बिल्कुल परिवर्तन नहीं करता, वह हर चीज को पहले जैसी रहने देता है।
सरकार बनने के बाद गांधीवाद के इस पलायन को दो दृष्टियों से देखना होगा-गांधीवाद जब विपक्ष में था, तो उसके अन्दर क्या था, और क्या नहीं था। उसमें चरखा था और राकेट नहीं था। यह वाक्य केवल मुहावरेबाजी नहीं है। वह गांधीवाद का कुछ अतिसरलीकरण तो है, लेकिन ये वाक्य गांधीवाद के सार को ठोस रूप देकर प्रस्तुत करता है। इस सार के उपर पडे आवरण को हटा दें, तो यह ऐसा अनाकर्ष कभी नहीं है लेकिन दुर्भाग्यवश, गांधीजी में असली टिका। बातें वक्ती बातों के साथ लिस तरह जुड़ी हुई हैं, जीवन की अनश्वरता के प्रति आश्वस्त आदमी ही उसका जोखिम उठा सकता था।
वे शायद सोचते थे कि उनके प्रिय शिष्य उनके सिद्धान्त की टिका। बातों को जीवित रखेंगे, और जरूरत के मुताबिक बदलने वाली वक्ती बातों से उसे सजाते रहेंगे, किन्तु शिष्यों के मामले में केाई पैगम्बर गांधीजी जैसा अभाग्यशाली नहीं रहा। बहरहाल इसके बारे में आगे फिर कहूंगा। चरखा वक्ती चीज है। इसी तरह प्राकृतिक चिकित्सा अंशगमहत्व की चीज है यद्यपि सर्वथा वक्ती नहीं। गांधीजी का ठोस प्रतीक तात्कालिक कार्य के लिए बहुत जरूरी है, लेकिन सव्यिता केा जारी रखने के लिए यह भी उतना ही जरूरी है कि ठोस प्रतीक में उसका उमूर्त सिद्धान्त निकाला जाय। ये सिद्धान्त हैं आदमी के पास ऐसे औजार होने चाहिए जिस पर कई अर्थों में उसका नियंत्रण हो। उसका तात्कालिक निवास क्षेत्र आत्मनिर्भर और प्रत्यक्ष लोकतंत्र द्वारा शासित हो। चरखे का सन्देश है नियत्रण मशीनें और गांव शासन।
सामान्य सिद्धान्त निकालने की निष्ठा होने पर भी, यह सिद्धान्त अभी नाकाफी है। गांधीजी में सादगी और छोटी मशीनों पर आग्रह साफ है, जबकि दुनिया बराबर पेचीदा मशीनों और विलासिता की ओर बढ रही है, तो कम से कम दुनिया के गोर लोग बढ रहे हैं। उनकी मिसाल का दबाव जबरदस्त है, और उनके नमूने के असर से कोई बच नहीं सकता। इसी कारण गांधीजी का आर्थिक चिन्तन स्वतंत्र स्थापना से अधिक एक संशोधन है। उनके अपने देशवासी यूरोप-अमरीका मशीनी ढांचे की नकल करने को आतुर है, और गांधीजी के संशोधन का बात अगर ज्यादा जोर से की जाये तो आसानी से रद्द कर दी जाती है। चर्खा और बिना सिले कपडे, इनके साथ अभी ही एक पुराण-पंथी गन्ध जुड गयी है, और सिद्धांत के शत्रु इसे हंसी में ही उडा देने को तैयार बैठे हैं। अगर कोई ऐसा आर्थिक चिन्तन विकसित हो सकता जो वर्तमन युग के मशीनी ढांचे से बिलकुल इनकार न करें, बल्कि उसमें गांधीवादी संशोधन को जोडें, उसके ठोस प्रतीक को नहीं, तो गांधीवाद सरकारी रूप में भी सार्थक हो सकता है। कट्टरपंथी मठी गांधीवादी ऐेसे सिद्धान्त के बारे में कह सकते हैं कि उसका गांधीजी से कोई ताल्लुक नहीं। और बाल की खाल निकालने वाले आलोचक उसे एक विकृति कह कर मखौल उडा सकते हैं। लेकिन सरकार के एक नए विधयात्मक सिद्धान्त के रूप में दुनिया उसका स्वागत करेगी।
आर्थिक विचारों का महत्व:-
गांधी चिन्तन स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व एवं पश्चात् स्वदेशी एवं विदेशी बुद्धिजीवी वर्ग की दिलचस्पी को अपनी ओर आछष्ट करता रहा है। रोम्या रोलां ने लिख है कि अगर भारत को समझना है तो गांधी और स्वामी विवेकानन्द को समझो वह सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि की झलक है। गांधीजी ने भारतीय परम्परा और संस्कृति का सूक्ष्म तथा विशाल दृष्टि से उसकी आन्तरिक शक्ति एवं निरन्तरता को समझा। इसी दृष्टि के निर्माण में संस्कारिक जडताओं से मुक्ति की चेष्टा प्रखरतम रूप से मौजूद है। गांधी सद्गुणी व्यक्ति एवं नैतिकता परक समाज के प्रयोजन से प्रेरित ऐसे जनतंत्र के पक्षधर थे।
4 नवम्बर 1948 को संविधान के दृवितीय प्रारूप पर विचार करने हेतु जब संविधान सभा की बैठक हुई, बैठक में इस आधार पर संविधान की आलोचना हुई कि यह संविधान न तो भारतीय है और ना ही गांधीवादी। प्रोफेसर एन.जी.रंगा ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रारूप संविधान में गांधी तथा उन असंख्य शहीदों जिनके कारण संविधान सभा का गठन सम्भव हुआ, की महान सेवाओं का उल्लेख और सिद्धान्तों का समावेश नहीं किया गया है। 1 शिबनलाल सक्सेना ने प्रारूप का विरोध करते हुए कहा था कि यह उन सब उद्दश्यों का प्रतिवाद है जिसके लिए गांधी ने संघर्ष किया था। 2 महावीर त्यागी इस निर्मित संविधान से अत्यन्त असंतुष्ट थे। उन्होंने संविधायकों से अपील की थी कि उन्हें इस प्रारूप की परख गांधी के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर करनी चाहिए और इस बात का सुनिश्चित करना चाहिए कि गांधी की मृत्यु के बाद इतनी जल्दी ही देश से गांधी दृष्टिकोण का विलोप न हो पाये। 3 डाॅ. अम्बेडकर का कहना था कि गांव संकीर्णता, अज्ञानता, अंधविश्वास और साम्प्रदायिकता व निम्न स्वार्थों की पूर्ति का अण्डा है। ग्रामीण गणतंत्र के कारण भारत का नाश हुआ है। ग्राम पंचायतांें को संविधान का आधार बनाना आत्मघाती और खतरनाक सिद्ध होगा। विकेन्द्रीकरण से अन्याय, अत्याचार, बढेगा, रूढिवादी कट्टर पंथी सना हथिया लेंगे। गांधीगप्रारूप हरिजन और गरीब का उत्थान करने वाला नहीं है बल्कि इसका यथार्थ व्यान्वयन भी असम्भव है। 4 संविधान सभा और उसके बाहर ग्राम पंचायतों के प्रति अभिव्यक्त अगाध प्रेम, विश्वास और राज व्यवस्था का आधार बनाये जाने की वकालत संविधान सभा के अधिकांश सदस्यों को आश्वस्त नहीं नहीं कर सके।
संविधायक सच्चे मन से पंचायत राज व्यवस्था सम्बन्धी गांधी विचारों को स्थापित करना नहीं चाहते थे अन्यथा संविधान निर्माण के प्रथम डांफ्ट, संविधान की प्रस्तावना इत्यादि में इसका उल्लेख पहले ही किया जा सकता था। यह कार्य तो गांधी समर्थकों द्वारा जीवन्त बहस का परिणाम रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण कारण गांधी के संच्च वारिस होने का दावा किया जा सके, इसलिए ऐसा किया गया अन्यथा पंचायत राज पर विस्तृत विवरण, दिशा निर्देश संविधान में निहित होते जैसे शक्तियां, निर्वाचन, विनीय प्रबन्धन इत्यादि। स्वतंत्र भारत के संविधान में अध्याय चार अनु. 40 स्पष्ट करता है कि राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिए अग्रसर होगा तथा उसको ऐसी शक्तियां और अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हे स्वायत शासन की इकाईयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है।
73 वां संविधान संशोधन अनिनियम 1992 की धारा 2 व 4 में संशोधन के साथ ही भाग 9 वी और 11वी अनुसूची को प्रतिस्थापित करता है। 6 राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अनुसरण में पहली बार सम्पूर्ण देश में पंचायती राज की संविधानिक व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार ग्राम सभा के सदस्यों के लिए सीटों का जनसंख्या के अनुपात मंें आरक्षण, महिलाओं के लिए कम से कम 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण, पंचायतों की अवधि पांच वर्ष करने व किसी पंचायत को भंग कर देने पर छः माह में चुनाव कराने की व्यवस्था की गई है। 11वी अनुसूची में पंचायतों के कार्य क्षे़ में आने वाले विषय दिए गए हैं।
गांधी के विचारों के अनुरूप पंचायत राज में गणराज्य के सभी गुण होने चाहिए। जिसमें स्वावलम्बन, स्वशासन आवश्यकतानुसर स्वंतत्रता और विकेन्द्रीकरण तथा कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका के सभी अधिकार पंचायत के पास हों। निर्णय आम सहमति या जनहित में हो, न कि मत गिनती द्वारा गांवों में गरीबी और बेरोजगारी निवारण जैसी सभी नीतियां निर्मित करने का दायित्व व अधिकार रखते हों। वास्तव में ग्राम का नागरिक बेरोजगार, भूखा, वस्तहीन न रहें ऐसे दायित्वों की पूर्ति का कार्य पंचायते करेंगी। अर्थात व्यक्ति की मूलभूत आवश्यता-भोजन, वस्त्र, आवास की जिम्मेदारी गांव अपने स्तर पर प्रबन्ध करेगा। लोगांें में प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग हो, अगर प्रतिस्पर्धा भी होगी तो अधिक सेवा करने की। चुनाव में शारीरिक श्रम करने वाले जनप्रतिनिधि खडे किए जाएंगे। समाज सेवी सदस्य को जनता स्वयं खडा करेगी, न कि राजनैतिक दलों द्वारा खडे किए गये व्यक्तियों में से किसी एक को वोट देना जनता की मजबूरी होगी। वास्तव में आज के प्रतिनिधियों को जन इच्छा का प्रतिनिधि कहना ही गलत है। जनता द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की जवाबदारी सुनिश्चित होगी। कदाचार, अनैतिकता और जनहित के विपरीत आचरण की स्थिति में 75 प्रतिशत जनता की इच्छा के अनुसार प्रतिनिधि को वापिस बुलाया जा सकेगा। गांधीय पंचायत राज सामूंहिक वृत के अनुरूप् होगा। पर के स्थान पर नीचे से पर ओर सना का विकेन्द्रीकरण होगा, यही गांधी के सपनों का पंचायत राज है।
उपसंहार:-
ग्रामवासियों को अपने कौशल में इतनी वृद्धि कर लेनी चाहिए कि उनके द्वारा तैयार की चीजें बाहर जाते ही हाथोंगहाथ बिक जाएं। जब हमार गांवों का पूर्ण विकास हो जाएगा तो वहां उंचे दर्जे के कौशल और कलात्मक प्रतिभा वाले लोगांें की कमी नहीं रहेगी। तब गांवों के अपने कवि भी होगें, कलाकार होगें, वास्तुशिल्पी होगें, भाषाविद् होगें और अनुसंधानकर्ता भी होगें। संक्षेप में, जीवन में जो कुछ भी प्राप्य है, वह सब गांवों में उपलब्ध होगा। आज हमारे गांव गोबर के ढेर मात्र हैं। कल वे सुंदरगसुंदर वाटिकाओं का रूप लेेंगे जिनमें इतनी प्रखर बुद्धि लोग निवास करेंगे जिन्हें न कोई धोखा दे सकेगा और न उनका शोषण कर सकेगा। ऊपर बताई गई पद्धति के अनुसार गांवों के पुरनिर्माण का कार्य तत्काल शुरू कर देना चाहिए गांवों का पुननिर्माण अस्थायी नहीं, स्थायी आधार पर किया जाना चाहिए।
हरि, 10-11-1946, पृ. 394
संदर्भ ग्रन्थ सूची
1. Chatterjee, Partha, A Princely Impostor? The kumar of Bhawal and the secret history of Indian nationalism, Permanent Black, New Delhi, 2002
2. Chatterjee, Partha, The Politics of the Governed: reflections on popular politics in most of the world, Permanent Black, New Delhi, 2004
3. Chaudhuri, Nirad C., The Autobiography of an Unknown Indian, University of California Press, Berkeley, 1968.
4. Cohn, B., Colonialism and Its Forms of Knowledge: the British in India, Princeton University Press, Princeton, 1996
5. Dalton, Dennis, Non-violence in Action: Gandhi’s power, Oxford University Press, Delhi, 1998
Received on 16.11.2018 Modified on 10.12.2018
Accepted on 27.01.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):125-130.